+ मङ्गलाचरण में जिनेन्द्र भगवान के गुणों का वर्णन -
(शार्द्रूलविक्रीडित)
सम्यग्दर्शन-बोध-वृत्त-समता-,शील-क्षमाद्यैर्घनै:;
संकेताऽऽश्रयवज्जिनेश्वर भवान्, सर्वैर्गुणैराऽऽश्रित: ।
मन्ये त्वय्यवकाश-लब्धि-रहितै:, सर्वत्र लोके वयं;
संग्राह्या इति गर्वितै: परिहृतो, दोषैरशेषैरपि ॥1॥
सम्यग्दर्शन-ज्ञान-चरणअरु, समता-क्षमा-शील गुणखान ।
किया आपका आश्रय सबने, संकेताश्रय सदन समान॥
जिन्हें मिली नहिं जगह आपमें, जगत् हमारा शरणागार ।
गर्वोन्नत हो सब दोषों ने, किया आपका प्रभु परिहार॥
अन्वयार्थ : हे प्रभो! हे जिनेश! निविड़ (अत्यन्त घने) सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान, सम्यक्चारित्र, समता, शील और क्षमा आदि समस्त गुणों ने परस्पर संकेत करके आपका आश्रय किया है; इसलिए आप में स्थान को न पाकर, समस्त लोक में 'हम ही संग्राह्य (ग्रहण करने योग्य) हैं' - ऐसे अभिमान से संयुक्त होकर, समस्त दोषों ने आपको छोड़ दिया है ।