+ कवित्व के अभिमान में प्रभु के गुणों का वर्णन करना असम्भव -
(वसन्ततिलका)
यस्त्वामनन्त-गुणमेकविभुं त्रिलोक्या:,
स्तौति प्रभूत-कविता-गुण-गर्वितात्मा ।
आरोहति द्रु शिर: स नरो नभोऽन्तं,
गन्तुं जिनेन्द्र! मति-विभ्रतो बुधोऽपि ॥2॥
'गुण अनन्तपति का स्तवन मैं करूँ' जिसे कविता का मान ।
मति-भ्रम से वह चढ़े वृक्ष पर, पाने हेतु गगन अवसान॥
अन्वयार्थ : हे जिनेन्द्र! आप अनन्त गुणों के भण्डार हैं, तीन लोक के स्वामी हैं - ऐसा समझ कर भी प्रचुर काव्य करने के गुण से जिसकी आत्मा गर्वसहित है अर्थात् जो कविता-चातुर्य का बड़ा भारी अभिमानी है - ऐसा कोई मनुष्य, आपकी सम्पूर्ण स्तुति करना चाहे तो समझना चाहिए कि वह बुद्धिमान मनुष्य, अपनी बुद्धि के भ्रम से (मूर्खता से) आकाश के अन्त को प्राप्त करने के लिए वृक्ष की चोटी पर चढ़ता है ।