+ प्रभु के प्रति भक्ति का प्रदर्शन -
शक्नोति कर्तुमिह क: स्तवनं समस्त-,
विद्याऽधिपस्य भवतो विबुधाऽर्चितांङ्घ्रे: ।
तत्राऽपि तज्जिनपते कुरुते जनो यत्,
तच्चित्त-मध्यगत-भक्ति-निवेदनाय ॥3॥
सुर-बुध पूजित विद्यापति की, स्तुति में है कौन समर्थ ?
तो भी जो स्तवन करते हैं, करें मनोगत भक्ति व्यक्त॥
अन्वयार्थ : हे प्रभो! आप समस्त विद्याओं के स्वामी हैं; आपके चरण, बड़े-बड़े देवों अथवा बड़े-बड़े पण्डितों द्वारा पूजित हैं, इसलिए संसार में आपकी स्तुति करने के लिए कोई भी समर्थ नहीं है; तथापि जो लोग आपकी स्तुति करते हैं, वे केवल अपने चित्त में व्याप्त भक्ति का निवेदन करने के लिए ही करते हैं, अन्य किसी कारण से नहीं ।