+ प्रभु के नाममात्र का स्मरण भी अनेक सिद्धियों का निधान -
नामाऽपि देव! भवत: स्मृति-गोचरत्वं,
वाग्गोचरत्वमथ येन सुभक्ति-भाजा ।
नीतं लभेत स नरो निखिलार्थ-सिद्धिं,
साध्वी स्तुतिर्भवतु मां किल कात्र चिन्ता ॥4॥
भक्त आपका सकल सिद्धियाँ, मात्र नाम जप कर पाता ।
तो हम उत्तम स्तुति कर सकते हैं या नहीं - व्यर्थ चिन्ता॥
अन्वयार्थ : हे जिनेन्द्र! आपका जो भक्त, आपका नाम-स्मरण भी करता है अथवा आपके नाम को वचनों द्वारा कहता है, उस मनुष्य को भी संसार में समस्त प्रकार की सिद्धियाँ प्राप्त हो जाती हैं; तो आपकी वह स्तुति, उत्तम रीति से हो अथवा न हो - इसकी चिन्ता नहीं है ।