+ परभव में भी प्रभु के चरणों की सेवा के लिए प्रार्थना -
एतावतैव मम पूर्यत एव देव,
सेवां करोमि भवतश्चरणद्वयस्य ।
अत्रैव जन्मनि परत्र च सर्वकालं,
न त्वामित: परमहं जिन! याचयामि ॥5॥
प्रभो! आपके चरण-युगल की, सेवा मुझको मिले सदा ।
उभय जन्म में यही भावना, अन्य न कुछ भी चाह कदा॥
अन्वयार्थ : हे जिनेश! मैं इस भव तथा पर भव में आपके दोनों चरण-कमलों की सदाकाल सेवा करता रहूँ - यही वरदान मुझे प्राप्त हो, इससे अधिक मैं आपसे कुछ भी नहीं माँगता हूँ ।