+ इस भव में प्रभु-भक्ति ही कल्याणकारी -
सर्वागमावगमत: खलु तत्त्वबोधो,
मोक्षाय वृत्तमपि सम्प्रति दुर्घटं न: ।
जाड्यात्तथा कुतनुतस्त्वयि भक्तिरेव,
देवाऽस्ति सैव भवतु क्रमतस्तदर्थ् ॥6॥
शास्त्र ज्ञान से तत्त्वबोध अरु, चारित होता किन्तु हमें ।
जड़ता और कुतन से दुर्लभ, अत: भक्ति दे मुक्ति हमें॥
अन्वयार्थ : निश्चय से समस्त प्रकार के शास्त्रज्ञान से तत्त्वों का ज्ञान होता है और उन्हीं शास्त्रों के अभ्यास से मोक्ष हेतु सम्यक्चारित्र की भी प्राप्ति होती है, किन्तु इस पंचम काल में हमारे लिए मूर्खता और दुर्गन्धमय शरीर के कारण, ये दोनों अत्यन्त दुर्घट हैं अर्थात् सहसा प्राप्त नहीं हो सकते, इसलिए आपकी भक्ति मुझे क्रम से मोक्ष देनेवाली हो - ऐसी प्रार्थना है ।