+ प्रतिकूल परिस्थितियों में भी जिनेन्द्र-भक्ति की प्रार्थना -
(मालिनी)
हरति हरतु वृद्धं, वार्धकं कायकान्तिं;
दधति दधतु दूरं, मन्दतामिन्द्रियाणि ।
भवति भवतु दु:खं, जायतां वा विनाश:;
परमिह जिननाथे, भक्तिरेका ममास्तु ॥7॥
घटती हो तो घटे काय की कान्ति, इन्द्रियाँ भी हों मन्द ।
जग में दु:ख हो या विनाश हो, किन्तु भक्ति हो सदा अमन्द॥
अन्वयार्थ : वृद्धावस्था, समस्त शरीर की कान्ति को नष्ट करे तो करे; समस्त इन्द्रियाँ, बहुत काल तक मन्द होती हों तो हों तथा संसार में दु:ख अथवा मेरा विनाश, जो होना हो सो हो; किन्तु जिनेन्द्र भगवान में मेरी भक्ति सदाकाल विद्यमान रहे - ऐसी प्रार्थना है ।