+ ज्ञानी भक्त को रत्नत्रय की ही इच्छा -
(वसन्ततिलका)
अस्तु त्रयं मम सुदर्शनबोधवृत्त-,
सम्बन्धि यान्तु च समस्त-दुरीहितानि ।
याचे न किञ्चिदपरं भगवन्! भवन्तं,
नाप्राप्तमस्ति किमपीह यतस्त्रिलोक्याम् ॥8॥
सम्यग्दर्शन-ज्ञान-चरित हो, सकल पाप का होय विनाश ।
अन्य न कुछ भी चाहूँ जिनवर! जग में कुछ नहिं मुझे अप्राप्त॥
अन्वयार्थ : हे प्रभो! इस संसार में सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान और सम्यक्चारित्ररूपी रत्नत्रयी मुझे प्राप्त हो तथा मेरे समस्त पाप नष्ट हो जावें - बस, यही मैं आपसे याचना करता हूँ । इससे भिन्न दूसरी वस्तु मैं नहीं मांगता क्योंकि संसार में इनसे भिन्न ऐसी कोई भी वस्तु नहीं है, जो मुझे प्राप्त न हुई हो ।