+ प्रभु-चरणों के प्रसाद से ही अतीन्द्रिय सुख की प्राप्ति -
धन्योऽस्मि पुण्यनिलयोऽस्मि निराकुलोऽस्मि,
शातोऽस्मि नष्ट-विपदस्मि विदस्मि देव ।
श्रीमज्जिनेन्द्र! भवतोऽङ्घ्रि-युगं शरण्यं,
प्राप्तोऽस्मि चेदहमतीन्द्रिय-सौख्यकारि ॥9॥
प्रभो! अतीन्द्रिय सुखदायक तव, चरण-कमल हैं प्राप्त मुझे ।
शान्त निराकुल पुण्यवान मैं, धन्य निरापद ज्ञानी हूँ॥
अन्वयार्थ : हे जिनेन्द्र! इन्द्रियों से रहित, अतीन्द्रिय सुख को प्राप्त करानेवाले आपके दोनों चरण-कमल, मुझे इस संसार में प्राप्त हो गए; अत: हे देव! मैं धन्य हूँ, पुण्यवान हूँ, समस्त प्रकार की आकुलताओं से रहित शान्त हूँ, ज्ञानी हूँ - ऐसा मैं मानता हूँ ।