
रत्नत्रये तपसि पंक्ति-विधे च धर्मे,
मूलोत्तरेषु च गुणेष्वथ गुप्ति-कार्ये ।
दर्पात् प्रमादत उतागसि मे प्रवृत्ते,
मिथ्यास्तु नाथजिनदेव! तव प्रसादात् ॥10॥
रत्नत्रय तप दश धर्मों में, मूलोत्तर गुण गुप्ति में ।
जो अपराध हुए प्रमाद से, तव प्रसाद से मिथ्या हों॥
अन्वयार्थ : हे प्रभो! हे जिनेश! सम्यग्दर्शनादि रत्नत्रय में, तप में, दश प्रकार के धर्म में मूलगुण और उत्तरगुण में तथा तीन प्रकार की गुप्ति में जो कुछ अभिमान से अथवा प्रमादवश अपराध लगा हो तो हे जिनदेव! आपके प्रसाद से वह मेरा अपराध सर्वथा मिथ्या हो ।