+ व्यवहार अहिंसा धर्म का निर्दोष पालन -
(उपजाति)
मनोवचोऽङ्गै: कृतमङ्गिपीडनं,
प्रमोदितं कारितमत्र यन्मया ।
प्रमादतो दर्पत एतदाश्रयं,
तदस्तु मिथ्या जिन! दुष्कृतं मम ॥11॥
यदि प्रमाद से या गर्वित हो, जीवों को मन-वच-तन से ।
पीड़ा दी हो कृत-कारित-अनुमोदन से वह मिथ्या हो॥
अन्वयार्थ : हे प्रभो! मैंने प्रमाद या अभिमान वश मन-वचन-काय द्वारा जीवों को पीड़ा दी हो, दूसरों से दिलवायी हो अथवा पीड़ा देनेवाले अन्य जीवों को अच्छा कहा हो तो मेरा यह समस्त पाप मिथ्या हो ।