
चिन्ता-दुष्परिणाम-सन्ततिवशादुन्मार्ग-गाया गिर:;
कायात्संवृति-वर्जितादनुचितं, कर्माऽर्जितं यन्मया ।
तन्नाशं व्रजतु प्रभो! जिनपते, त्वत्पाद-पद्म-स्मृते-;
रेषा मोक्षफलप्रदा किल कथं, नास्मिन् समर्था भवेत् ॥12॥
चिन्ता दुष्परिणाम सन्तति, या कुमार्गगत वाणी से ।
संवर विरति तन से अब तक, मुझको जो भी कर्म बँधे॥
तेरे चरणों की स्मृति से, वे सब कर्म नष्ट हों देव !
यह स्मृति तो शिवफलदायी, क्यों न समर्थ बने उसमें॥
अन्वयार्थ : हे प्रभो! हे जिनेन्द्र! चिन्ता से, खोटे परिणामों की सन्तति से, खोटे मार्ग से गमन करनेवाली वाणी से और संवर से रहित शरीर से, जो मैंने नाना प्रकार के कर्मों का उपार्जन किया है; वे समस्त कर्म, आपके चरण-कमलों के स्पर्श से सर्वथा नाश को प्राप्त हों क्योंकि आपके दोनों चरण-कमलों की स्मृति, निश्चय से मोक्षफल को देनेवाली है तो फिर क्या वह पाप कर्मों के नाश करने में समर्थ नहीं होगी?