
वाणी-प्रमाणमिह सर्व-विदस्त्रिलोकी-,
सद्मन्यसौ प्रवर-दीप-शिखा-समाना ।
स्याद्वादकान्ति-कलिता नृसुराहि-वन्द्या,
कालत्रये प्रकटिताखिल-वस्तु-तत्त्वा ॥13॥
स्याद्वादमय कान्तिमान सुर-नर-वन्दित सर्वज्ञ-वचन ।
त्रिभुवन गृह में दीपशिखा सम, करें तत्त्व का उद्घाटन॥
अन्वयार्थ : सर्वज्ञदेव की वाणी स्याद्वादरूपी कान्ति से संयुक्त है; जिसकी स्तुति, मनुष्य-देव-नागकुमार आदि सब करते हैं । वह स्याद्वाद-वाणी तीन काल के समस्त तत्त्वों को प्रकट करनेवाली है; अत: तीन लोकरूपी घर में उत्कृष्ट दीपशिखा के समान प्रमाणभूत है ।