+ जिनेन्द्र व शास्त्र-स्तुति में हुई हीनता पूर्व संस्कारवशात् -
(पृथ्वी)
क्षमस्व मम वाणि तज्जिनपति-श्रुतादि-स्तुतौ;
यदू नमभवन्मनो-वचन-काय-वैकल्यत: ।
अनेक-भव-सम्भवैर्जडिम-कारणै: कर्मभि:;
कुतोऽत्र किल मादृशे जननि तादृशं पाटवम् ॥14॥
मन-वच-तन में हुई विकलता, जिनपतिश्रुत की स्तुति में ।
मुझ से दोष हुए हों तो हे माता! मुझको क्षमा करें॥
क्योंकि मूढ़ता के कारण जो, पूर्व भवों में कर्म बँधे ।
उनसे स्तुति करने की, चतुराई कैसे आए मुझे॥
अन्वयार्थ : हे सरस्वती माता! मन-वचन-काय की विकलता से जिनेन्द्र भगवान अथवा शास्त्र की स्तुति में मेरे द्वारा कुछ हीनता हुई हो तो वह क्षमा हो क्योंकि स्वयं की जड़ता के कारण अनेक भवों में उत्पन्न जो कर्मादि हैं; उनसे मुझ समान मनुष्य को जिनेन्द्र तथा शास्त्रादि की भली-भाँति स्तुति करने में कहाँ चतुरता आ सकती है? अर्थात् नहीं आ सकती ।