
क्रियाकाण्डसम्बन्धिनी चूलिकेयं,
नरै: पठ्यते यैस्त्रिसन्ध्यं च तेषाम् ।
वपुर्भारती-चित्त-वैकल्यतो या,
न पूर्णा क्रिया सापि पूर्णत्वमेति ॥16॥
क्रियाकाण्ड सम्बन्धी यह चूलिका, पढ़े जो भव्य त्रिकाल ।
विकल मनो-वच-तन से क्रिया अपूर्ण, पूर्ण होती तत्काल॥
अन्वयार्थ : जो भव्य जीव, इस क्रियाकाण्ड सम्बन्धिनी चूलिका को तीनों काल नियमित पढ़ता है; उस भव्य जीव के मन-वचन-काय की विकलता के कारण जो क्रिया पूर्ण नहीं हुई है; वह भी शीघ्र ही पूर्ण हो जाती है ।