
चैतन्यैकत्व-संवित्ति:, दुर्लभा सैव मोक्षदा ।
लब्धा कथं कथञ्चिच्चेत्, चिन्तनीया मुर्हुमुहु: ॥4॥
चैतन्य के एकत्व का, है ज्ञान दुर्लभ मोक्षप्रद ।
हो जाए यदि वह ज्ञान तो फिर, करो उसका ही मनन॥
अन्वयार्थ : चैतन्य के एकत्व का ज्ञान अत्यन्त दुर्लभ है, किन्तु वह ज्ञान ही मोक्ष को देनेवाला है; इसलिए यदि किसी प्रकार उस चैतन्य का ज्ञान हो जाए तो बारम्बार उसका ही चिन्तवन करना चाहिए ।