
किञ्चित्संसार-सम्बन्धि-,बन्धुरं नेति निश्चयात् ।
गुरूपदेशतोऽस्माकं, नि:श्रेयस-पदं प्रियम् ॥6॥
संसार-सम्बन्धी न कोई, प्रिय हमें परमार्थ से ।
मोक्षपद ही प्रिय हमें, गुरुदेव के उपदेश से॥
अन्वयार्थ : संसार-सम्बन्धी कोई भी वस्तु, निश्चय से हमको प्रिय नहीं है, किन्तु श्रीगुरु के उपदेश से हमको मोक्षपद ही प्रिय है ।