
मोहोदय-विषाक्रान्त-, मपि स्वर्गसुखं चलम् ।
का कथाऽपर-सौख्याना-,मलं भव-सुखेन मे ॥7॥
मोह-विष से व्याप्त दिवि-सुख, भी क्षणिक है जब अरे !
अन्य सुख की क्या कथा? बस! हो जगत् के सुखों से॥
अन्वयार्थ : यदि मोहोदयरूपी विष से व्याप्त स्वर्गसुख भी संसार में विनाशीक है तो स्वर्ग से भिन्न जितने भी सुख हैं, उनकी क्या कथा है? अर्थात् वे तो अवश्य ही विनाशीक हैं; इसलिए मुझे संसार-सम्बन्धी सुख नहीं चाहिए ।