+ इस भव में आत्मा का लक्ष्य करनेवाले का परभव भी श्रेष्ठ -
लक्ष्यीकृत्य सदात्मानं, शुद्ध-बोधमयं मुनि: ।
आस्ते य: सुतिश्चात्र, सोऽप्यमुत्र चरन्नपि ॥8॥
सद्ज्ञानमय निज आत्मा का, लक्ष्य जो बुध मुनि करें ।
परलोक में भी वे निजात्मा, का सदा आश्रय करें॥
अन्वयार्थ : श्रेष्ठ बुद्धि के धारक जो मुनि, इस भव में निर्मल सम्यग्ज्ञानस्वरूप श्रेष्ठ आत्मा का लक्ष्य करते हैं; वे परभव में जाने पर भी आत्मा को ही लक्ष्य करते हैं ।