
वीतरागपथे स्वस्थ:, प्रस्थितो मुनिपुङ्गव: ।
तस्य मुक्तिसुख-प्राप्ते:, क: प्रत्यूहो जगत्त्रये ॥9॥
स्वस्थ मुनि जो वीतरागी, मार्ग में करते गमन ।
इनको नहीं त्रय लोक में, शिव-प्राप्ति में कोई विघन॥
अन्वयार्थ : जिन मुनिराजों ने अपने आत्मस्वरूप में स्थित रह कर, वीतरागमार्ग में गमन किया है; उन मुनिराजों को तीन लोक में मोक्ष-प्राप्ति में कोई भी विघ्न नहीं आ सकता है ।