+ निर्मल धर्म धारक, चिन्ता तथा मरण से निर्भय -
एतज्जन्मफलं धर्म:, स चेदस्ति ममामल: ।
आपद्यपि कुतश्चिन्ता, मृत्योरपि कुतो भयम् ॥11॥
इस जन्म का फल धर्म निर्मल, मम हृदय में यदि बसे ।
तो आपदाओं की कभी, चिन्ता मरण-भय ना रहे॥
अन्वयार्थ : इस मनुष्य भव का फल धर्म है । यदि मुझमें वह निर्मल धर्म मौजूद है तो आपत्ति के आने पर भी मुझे चिन्ता नहीं और मरण से भी भय नहीं ।