
मोह-द्वेष-रति-श्रिता विकृतयो, दृष्टा: श्रुता: सेविता:;
वारम्वारमनन्त-काल-विचरत्, सर्वाङ्गिभि: संसृतौ ।
अद्वैतं पुनराऽऽत्मनो भगवतो, दुर्लक्ष्यमेकं परं;
बीजं मोक्षतरोरिदं विजयते, भव्यात्मभिर्वन्दितम् ॥1॥
काल अनन्त-भ्रमण करते, इस जग के सारे जीवों ने ।
मोह-द्वेष-रागाश्रित विकृति, देखी-सुनी और भोगी॥
पर अखण्ड भगवान आत्मा, का न हुआ अब तक अनुभव ।
भव्यजनों से अभिनन्दित, शिवतरु का बीज सदा जयवन्त॥
अन्वयार्थ : संसार में अनन्त काल से भ्रमण करते हुए प्राणियों ने मोह-राग-द्वेष के आश्रित विकार को अनन्त बार देखा-सुना तथा अनुभव किया है, किन्तु भगवान आत्मा के अद्वैत स्वभाव को एक बार भी न देखा है, न सुना है और न अनुभव ही किया है; इसलिए अत्यन्त कठिन रीति से देखने योग्य एक, उत्कृष्ट, मोक्षरूपी वृक्ष का बीजभूत तथा भव्य जीवों के द्वारा सदा वन्दनीय - ऐसा यह भगवान आत्मा का अद्वैतपना, इस लोक में सदा जयवन्त रहे ।