
अन्तर्बाह्य-विकल्प-जाल-रहितां, शुद्धैक-चिद्रूपिणीं;
वन्दे तां परमात्मन: प्रणयिनीं, कृत्यान्तगां स्वस्थताम् ।
यत्राऽनन्त-चतुष्टयाऽमृत-सरित्याऽऽत्मानमन्तर्गतम्;
न प्राप्नोति जरादि-दु:सह-शिखो, जन्मोग्र-दावानल: ॥2॥
अन्तर्बाह्य विकल्परहित, चिद्रूप शद्ध कृतकृत्य अहो !
परमात्मा से प्रीति बढ़ाती, स्वानुभूति को वन्दन हो॥
क्योंकि अनन्त चतुष्टय अमृत में डूबे इस चेतन को ।
दु:सह जरा शिखामय जन्मादिक दावानल प्राप्त न हो॥
अन्वयार्थ : जो स्वस्थता, अन्तरंग तथा बहिरंग, दोनों प्रकार के विकल्पों से रहित है, शुद्ध चैतन्यस्वरूप को धारण करने वाली है, परमात्मा से प्रीति कराने वाली तथा कृतकृत्य है - ऐसी उस स्वस्थता को मैं नमस्कार करता हूँ क्योंकि अनन्त विज्ञानादि चतुष्टयस्वरूप स्वस्थता से युक्त अमृत नदी के मध्य में विद्यमान आत्मा को वृद्धावस्था आदि दुस्सह ज्वालाओं को धारण करने वाली जन्मरूपी भयंकर अग्नि प्राप्त ही नहीं कर सकती ।