+ एकत्व-स्थिति-पूर्वक शील आदि से युक्त होने पर परम आनन्द -
एकत्व-स्थितये मतिर्यदनिशं, संजायते मे तया-;
प्यानन्द: परमात्म-सन्निधि-गत:, किञ्चित्समुन्मीलति ।
किञ्चित्कालमवाप्य सैव सकलै:, शीलैर्गुणैराश्रितां;
तामानन्द-कलांविशाल-विलसद्,बोधां करिष्यत्यसौ ॥3॥
यदि एकत्वस्वभावी आतम में जाए मेरा मतिज्ञान ।
उससे भी परमात्मा जैसा, किञ्चित् हो आनन्द महान॥
यदि वह किञ्चित्काल श्रेष्ठ, शीलादिक गुण धारण करता ।
तो ज्ञानानन्द के विलासमय, कला सुनिश्चित पा लेता॥
अन्वयार्थ : जब-जब मेरी बुद्धि, निरन्तर एकत्व-स्थिति करने के लिए जाती है तो उससे मुझे परमात्मा सम्बन्धी कुछ-कुछ आनन्द उत्पन्न होता है । यदि वही मेरी बुद्धि, कुछ काल तक समस्त शीलादि उत्तम गुणों से सहित होकर रहेगी तो अवश्य ही विशाल तथा दैदीप्यमान ज्ञान की आनन्दकला को प्राप्त हो जाएगी - ऐसा मेरा विश्वास है ।