
केनाऽप्यस्ति न कार्याश्रितवता, मित्रेण चान्येन वा;
प्रेाङ्गेऽपि न मेऽस्ति सम्प्रति सुखी, तिष्ठाम्यहं केवल: ।
संयोगेन यदत्र कष्टमभवत्, संसार-चके्र चिरं;
निर्विण्ण: खलु तेन तेन नितरा-,मेकाकिता रोचते ॥4॥
मुझे न आश्रित मित्रादिक या अन्य किसी से काम नहीं ।
तन से भी अब प्रीति नहीं, मैं अपने में ही रहूँ सुखी॥
इस संसार-चक्र में ही मैं, संयोगों से दु:खी हुआ ।
अब चाहूँ एकान्तवास मैं, पर से रहूँ उदास सदा॥
अन्वयार्थ : मेरे आश्रित जो मित्र हैं, न तो मुझे उनसे और न दूसरों से ही मुझे कुछ भी काम है, अपने शरीर के साथ भी मुझे प्रीति नहीं है । इस समय मैं अकेला ही सुखी हूँ क्योंकि मुझे संसाररूपी चक्र में इष्ट-मित्रादि के संयोग के कारण अनन्त कष्ट हुआ है, अत: मैं निश्चय से उनके प्रति उदासीन हूँ तथा अब, मुझे एकान्त स्थान ही प्रिय लगता है ।