
यो जानाति स एव पश्यति सदा, चिद्रूपतां न त्यजेत्;
सोऽहं नाऽपरमस्ति किञ्चिदपि मे, तत्त्वं सदेतत्परम् ।
याच्चाऽन्यत्तदशेष-कर्म-जनितं, क्रोधादि-कायादि वा;
श्रुत्वा शास्त्र-शतानि सम्प्रति मन-,स्येतच्छ्रुतं वर्तते ॥5॥
सदा जानता वही देखता, तजे नहीं चैतन्यस्वरूप ।
वह मैं ही हूँ अन्य न किञ्चित्, यह ही तत्त्व परम सत्रूप॥
कर्मजन्य क्रोधादि तथा कायादि सभी हैं मुझसे भिन्न ।
सौ शास्त्रों को सुन कर मेरे, मन में जमा यही सिद्धान्त॥
अन्वयार्थ : जो जानता है, वही सदा देखता है और जो चैतन्यस्वरूप को कभी नहीं छोड़ता है, वह मैं ही हूँ; अन्य पदार्थ मेरे कुछ भी नहीं हैं, यही समीचीन तत्त्व है । क्रोधादि तथा शरीरादि समस्त कर्मोत्पन्न हैं - यही सिद्धान्त, मैने सैकड़ों शास्त्रों को सुन कर मन में स्थित किया है ।