+ चैतन्यस्वरूप में गुप्त मन वाले मुझसे समस्त परपदार्थ भिन्न -
हीनं संहननं परीषह-सहं, नाऽभूदिदं साम्प्रतं;
काले दु:खमसंज्ञकेऽत्र यदपि, प्रायो न तीव्रं तप: ।
कश्चिन्नातिशयस्तथापि यदसा-,वार्तं हि दुष्कर्मणा-;
मन्त:शुद्धचिदात्म-गुप्तमनस:, सर्वं परं तेन किम् ॥6॥
काल दु:खम हीन संहनन, परिषह-सहन नहीं होता ।
और आजकल प्राय: हमसे, तप भी तीव्र नहीं होता॥
कोई भी अतिशय नहिं होता, कर्मों से मैं दु:खी सदा ।
शुद्ध चिदातम गुप्त मुझे अब, पर से रहा प्रयोजन क्या ?
अन्वयार्थ : जिसका नाम दु:खमा है - ऐसे पंचम काल में संहनन हीन होता है; इसलिए इस समय वह संहनन, परीषहों को सहने वाला भी नहीं होता है और प्राय: करके तीव्र तप भी नहीं हो सकता है । इस काल में किसी प्रकार का अतिशय नहीं होने से भी मैं दुष्कर्मों से पीड़ित हूँ, इसलिए अन्तरंग शुद्ध चैतन्यस्वरूप में गुप्त मन के धारी मुझसे समस्त पदार्थ पर हैं, अत: मुझे परपदार्थों से क्या प्रयोजन है? अर्थात् कुछ भी प्रयोजन नहीं है ।