
सद्-दृग्बोध-मयं विहाय परमानन्द-स्वरूपं परं;
ज्योतिर्नान्यदहं विचित्र-विलसत्, कर्मैकतायामपि ।
कार्ष्ण्ये कृष्णपदार्थ-सन्निधिवशात्, जाते मणौ स्फाटिके;
यत्तस्मात्पृथगेव स द्वयकृतो, लोके विकारो भवेत् ॥7॥
विविध कर्म से बद्ध किन्तु मैं, सद्-ज्ञान-दर्शन नहिं तजूँ ।
परमानन्द चैतन्य-ज्योति से भिन्न आत्मा नहिं लखूँ॥
स्फटिक मणि में कृष्ण वस्तु के, संग में कालापन दिखता ।
किन्तु भिन्न वह स्फटिक मणि है, द्वयकृत ही विकार होता॥
अन्वयार्थ : नाना प्रकार के विद्यमान कर्मों की एकता होने पर भी मैं सम्यग्दर्शन-सम्यग्ज्ञानस्वरूप, परमानन्द तथा उत्कृष्ट तेज के धारी आत्मा को छोड़ कर भिन्न नहीं हूँ अर्थात् आत्मस्वरूप ही मैं हूँ क्योंकि कृष्ण पदार्थ के सम्बन्ध से स्फटिक मणि के कृष्ण वर्णमय होने पर भी वह कृष्णता, उस स्फटिकमणि से भिन्न ही है । संसार में जो विकार उत्पन्न होता है, वह दो पदार्थों द्वारा किया हुआ ही होता है ।