
आपत्साऽपि यते: परेण सह य:, सङ्गो भवेत्केनचित्;
सापत्सुष्ठु गरीयसी पुनरहो, य: श्रीमतां सङ्गम: ।
यस्तु श्रीमदमद्यपान-विकलै-,रुत्तानिताऽस्यैर्नृपै:;
सम्पर्क: स मुमुक्षु-चेतसि सदा, मृत्योरपि क्लेशकृत् ॥8॥
यदि यति का हो संग अन्य से, तो मानें आपत्ति है ।
श्रीमन्तों का संगम हो तो, यह भी महाविपत्ति है॥
यदि लक्ष्मी की मद-मदिरा से, गर्वित गहल नृपति का संग ।
हो जाए तो मुमुक्षु मुनि को, मरणतुल्य दु:खदायक संग॥
अन्वयार्थ : यति पुरुष का किसी अन्य पदार्थ के साथ सम्बन्धित होना, यह एक प्रकार की आपत्ति है, फिर यदि उनका श्रीमन्तों के साथ सङ्गम हो जाए तो यह बड़ी भारी आपत्ति है तथा जो पुरुष लक्ष्मी के मदरूपी मदिरा से मत्त हो रहे हैं और जिनका मुख ऊपर को है - ऐसे राजाओं के साथ सम्बन्ध हो जाए तो यह सम्बन्ध, मोक्षाभिलाषी के चित्त में मरण से भी अधिक दु:ख देने वाला है ।