
स्निग्धा मा मुनयो भवन्तु गृहिणो, यच्छन्तु मा भोजनं;
मा किञ्चिद्धनमस्तु मा वपुरिदं, रुग्वर्जितं जायताम् ।
नग्नं मामऽवलोक्य निन्दतु जन:, तत्राऽपि खेदो न मे;
नित्यानन्द-पद-प्रदं गुरु-वचो, जागर्ति चेच्चेतसि ॥9॥
यदि आनन्द-प्रदायक गुरु-वचनों से चित्त प्रकाशित है ।
तो मुनि मुझसे प्रीति करें नहिं, या गृहस्थ नहिं भोजन दें॥
मेरे पास न किञ्चित् धन हो, या तन नहीं नीरोग रहे ।
नग्न देख निन्दा हो तो भी, मन में किञ्चित् खेद न हो॥
अन्वयार्थ : सदा आनन्द को देने वाला - ऐसा श्रीगुरु का वचन, यदि मेरे चित्त में प्रकाशमान है तो यदि मुनिगण, मुझ पर प्रीति न करें, गृहस्थ लोग मुझे भोजन न दें, मेरे पास कुछ भी धन भले ही न रहे, मेरा शरीर रोग से युक्त रहे और लोग, मुझे नग्न देख कर, मेरी निन्दा भी करें तो मुझे किसी प्रकार का खेद नहीं है ।