+ गुरु प्रकाशित मार्ग में गमन करने से निर्वाण की प्राप्ति -
दु:ख-व्याल-समाकुले भव-वने, हिंसादि-दोष-द्रुमे;
नित्यं दुर्गति-पल्लि-पाति-कुपथे, भ्राम्यन्ति सर्वेऽङ्गिन: ।
तन्मध्ये सुगुरु-प्रकाशित-पथे, प्रारब्धयानो जन:;
यात्यानन्दकरं परं स्थिरतरं, निर्वाणमेकं पदम् ॥10॥
भव-वन नाना दु:ख-सर्प, एवं हिंसादिक-तरु से व्याप्त ।
इसमें भ्रमते जीव सभी सदा, दुर्गति-भील बस्ती से युक्त॥
उसमें सुगुरु प्रकाशित पथ पर, भव्य जीव जो गमन करें ।
वे नर शाश्वत सुखप्रद निश्चल, शिवपद निश्चित प्राप्त करें॥
अन्वयार्थ : संसाररूपी वन, नाना प्रकार के दु:खरूपी हाथी-अजगर इत्यादि से व्याप्त है; जिसमें हिंसा, असत्य, चोरी आदि दोषरूपी वृक्ष मौजूद हैं । यह संसाररूपी वन, दुर्गतिरूपी भीलों से सहित खोटे मार्ग से युक्त है, जिसमें अनेक जीव भ्रमण कर रहे हैं; किन्तु उसी संसाररूपी वन में उत्तम गुरुओं द्वारा प्रकाशित मार्ग पर जो मनुष्य, गमन करते हैं, वे मनुष्य, उत्तम आनन्द को देनेवाले, उत्कृष्ट, निश्चल और अनुपम निर्वाणस्थान को प्राप्त होते हैं ।