
यत्सातं यदसातमङ्गिषु भवेत्, तत्कर्म-कार्यं तत:;
तत्कर्मैव तदन्यदात्मन इदं, जानन्ति ये योगिन: ।
ईदृग्भेद-विभावनाश्रित-धियां, तेषां कुतोऽहं सुखी;
दु:खी चेति विकल्प-कल्मष-कला, कुर्यात्पदं चेतसि ॥11॥
जीवों को जो सुख-दु:ख होते, वे सब कर्मोदय से हैं ।
कर्म भिन्न हैं शुद्धातम से-ऐसा जो योगी जानें॥
भेदज्ञान धारामय मति से, सुखी-दु:खी कैसे होवें ?
उनके चित् को यह विकल्प, किञ्चित् भी कैसे मलिन करें ?
अन्वयार्थ : जीव में होने वाले सुख-दु:ख, सभी कर्मों के कार्य हैं; इसलिए वे सब कर्म ही हैं और वे कर्म, आत्मा से भिन्न हैं - इस बात को जो योगीश्वर जानते हैं अर्थात् इस प्रकार की भेदभावना भाने वाले योगीश्वरों के मन में 'मैं सुखी हूँ या मैं दु:खी हूँ' - इस प्रकार के विकल्प-सम्बन्धी जरा-सी भी मलिनता स्थान को प्राप्त नहीं करती ।