
देवं तत्प्रतिमां गुरुं मुनिजनं, शास्त्रादि मन्यामहे;
सर्वं भक्तिपरा वयं व्यवहृते, मार्गे स्थिता निश्चयात् ।
अस्माकं पुनरेकताश्रयणतो, व्यक्तीभवच्चिद्गुण-;
स्फारीभूत-मति-प्रबन्ध-महसामात्मैव तत्त्वं परम् ॥12॥
जब तक हम व्यवहार मार्ग में, तब तक भक्ति-परायण हैं ।
जिनवर जिनप्रतिमा जिनगुरु जिनशास्त्रों का श्रद्धान करें॥
लेकिन निश्चयनय से केवल, चिन्मयगुण धारक जो तेज ।
वह आत्मा ही मुझको तो, परमतत्त्व है अन्य नहीं॥
अन्वयार्थ : जब तक हम व्यवहार मार्ग में स्थित हैं, तभी तक हम भक्ति में तत्पर होकर देव, देव-प्रतिमा, गुरुओं, मुनिजनों तथा शास्त्रादि को मानते हैं । निश्चयनय से तो एकत्व के आश्रय से प्रगट होनेवाले चैतन्यरूपी गुण से प्रगल्भ बुद्धि सम्बन्धी तेज का धारी हमारा केवल एक आत्मा ही उत्कृष्ट तत्त्व है; इससे भिन्न अन्य कोई तत्त्व ही नहीं है ।