+ मुझे कोई कैसा भी कष्ट दे, किन्तु मुझे कोई भय नहीं -
वर्षं हर्ष पाकरोतु तुदतु, स्फीता हिमानी तनुं;
घर्म: शर्महरोऽस्तु दंशमशकं, क्लेशाय सम्पद्यताम् ।
अन्यैर्वा बहुभि: परीषहभटैरारभ्यतां मे मृति:;
मोक्षं प्रत्युपदेश-निश्चल-मतेर्नात्रापि किञ्चिद् भयम् ॥13॥
अतिवर्षा से चैन नष्ट हो, या तुषार दे तन-पीड़ा ।
सूर्य-ताप भी नष्ट करे सुख, मच्छर-डाँस करें पीड़ा॥
अथवा अन्य परीषह-भट से, मरण प्राप्त भी हो मुझको ।
मोक्षमार्ग में निश्चल बुद्धि , अत: न कुछ भी भय मुझको॥
अन्वयार्थ : चाहे मेरे आनन्द को वर्षा नष्ट करे, चाहे बर्फ का समूह मेरे शरीर को पीड़ा दे, चाहे सूर्य का आतप मेरे कल्याण का नाश करे, चाहे डाँस-मच्छर मुझे दु:ख देवें अथवा अन्य शेष बचे हुए परीषहरूपी सुभटों से भले ही मेरा मरण हो जाए तो भी मुझे किसी से कुछ भी भय नहीं है क्योंकि मेरी बुद्धि, मोक्ष के प्रति उपदेश से निश्चल है ।