+ सर्व शक्तिमान का विचार - जो कुछ होना है, वह तो होगा ही -
चक्षुमुर्ख्य-हृषीक-कर्षक-मयो, ग्रामो मृतो मन्यते;
चेद्रूपादि-कृषि-क्षमां बलवता, बोधारिणा त्याजित: ।
तच्चिन्तां न च सोऽपि सम्प्रति करोत्यात्मा प्रभु: शक्तिमान्;
यत्किञ्चिद्भविताऽत्र तेन च भवोऽप्यालोक्यते नष्टवत् ॥14॥
नेत्रप्रधान इन्द्रिय-कृषक-ग्राम भी यदि नष्ट हो ।
रूप-रसादिक विषयों की कृषि-भूमि से भी रहित हो॥
तो भी शक्तिमान प्रभु चेतन! उनकी चिन्ता नहीं करे ।
होनहार ही जग में होती, वह जग को नश्वर समझे॥
अन्वयार्थ : आत्मा, सर्व शक्तिशाली प्रभु है । वह सम्यग्ज्ञान के वैरी ज्ञानावरण कर्म के द्वारा नेत्रप्रधान इन्द्रियरूपी किसानों से बने हुए ग्राम को मरा हुआ मानता है तथा उन इन्द्रियरूपी किसानों को रूपादि खेती की जमीन से रहित भी मानता है तथा उन इन्द्रिय एवं इन्द्रिय-विषयों की वह आत्मा कुछ भी चिन्ता नहीं करता क्योंकि वह समझता है कि जो कुछ होने वाला है, वह होगा, इसलिए वह समस्त जगत् को सर्वथा नष्ट-सा ही समझता है ।