+ संयमी संसार में रहता हुआ भी जल से भिन्न कमल -
कर्म-क्षत्युपशान्ति-कारणवशात्, सद्देशनाया गुरो-;
रात्मैकत्व-विशुद्ध-बोध-निलयो, नि:शेष-संगोज्झित: ।
शश्वत्तद्गत-भावनाश्रितमना, लोके वसन् संयमी;
नावद्येन स लिप्यतेऽब्ज-दलवत्, तोयेन पद्माकरे ॥15॥
कर्मों के उपशम या क्षय से, अथवा गुरु-वचनामृत से ।
निर्मल आत्मज्ञान का धारी, विरक्त समस्त परिग्रह से॥
आत्मभावनारत योगी यदि, किञ्चित् काल जगवास करे ।
तो भी जल में पद्म-पत्र सम, वह अलिप्त सब पापों से॥
अन्वयार्थ : जो समस्त प्रकार के परिग्रहों से रहित है, जिसका मन निरन्तर आत्मभावना से सहित है, कर्मों के क्षय या उपशम से अथवा गुरु के उत्तम उपदेश से जो आत्मा के एकत्व को प्राप्त करके निर्मल ज्ञान का स्थान है - ऐसा वह संयमी, संसार में रहता हुआ भी जिस प्रकार सरोवर में कमल का पत्ता जल से लिप्त नहीं होता, उसी प्रकार अंशमात्र भी पापों से लिप्त नहीं होता ।