
गुर्वंघ्रि-द्वय-दत्त-मुक्ति-पदवी-, प्राप्त्यर्थनिर्ग्रन्थता-;
जातानन्द-वशान्ममेन्द्रिय-सुखं, दु:खं मनो मन्यते ।
सुस्वादु: प्रतिभासते किल खल:, तावत्समासादितो;
यावन्नो सित-शर्करातिमधुरा, सन्तर्पिणी लभ्यते ॥16॥
गुरु-चरणों से शिवपद हेतु, प्राप्त हुई निर्ग्रन्थदशा ।
उससे जो आनन्द हुआ तो, इन्द्रिय-सुख भासे दु:खदा॥
जब तक स्वच्छ मधुर मिश्री का, स्वाद नहीं मिलता जन को ।
तब तक खलि ही अज्ञानी को, मधुर इष्टतम भासित हो॥
अन्वयार्थ : श्रीगुरु के दोनों चरणों से प्रदान की हुई मोक्ष-पदवी की प्राप्ति के लिए निर्ग्रन्थता से उत्पन्न आनन्द के कारण मेरा मन इन्द्रियजनित सुख को 'दु:ख ही है' - ऐसा मानता है, वह ठीक ही है क्योंकि जब तक स्वच्छ, अत्यन्त मधुर और तृप्ति करने वाली शर्करा की प्राप्ति नहीं होती, तब तक ही खल अत्यन्त मिष्ट मालूम पड़ती है ।