
निर्ग्रन्थत्व-मुदा ममोज्ज्वलतर-, ध्यानाश्रित-स्फीतया;
दुर्ध्यानाक्ष-सुखं पुन: स्मृतिपथ-, प्रस्थाय्यपि स्यात्कृत: ।
निर्गत्योद्गत-वात-बोधित-शिखि-,ज्वाला-करालाद् गृहाच्छ
ीतां प्राप्य च वापिकां विशति क:, तत्रैव धीमान्नर: ॥17॥
निर्मल ध्यानमयी निर्ग्रन्थ-दशा में जब आनन्द हुआ ।
तो कुध्यानमयी इन्द्रियसुख, सुमिरन कैसे हो सकता ?
पवन-प्रताड़ित दावानल से, जलते हुए सदन को छोड़ ।
शीतल वापी में जाकर फिर, पुन: अग्नि में जाए कौन ?
अन्वयार्थ : हे प्रभु! अत्यन्त निर्मल ध्यान के आश्रय से वृद्धिंगत निर्ग्रन्थता से उत्पन्न आनन्द यदि मुझमें विद्यमान है तो मुझे विपरीत ध्यान से उत्पन्न इन्द्रिय-सम्बन्धी सुख का कैसे स्मरण हो सकता है? क्योंकि ऐसा कौन बुद्धिमान पुरुष होगा, जो प्रवाहित पवन से जाज्ज्वल्य-मान अग्नि की भयंकर ज्वाला से जलते हुए घर से निकल कर, शीतल कुएँ को पाकर, पुन: उसी भयंकर अग्निगृह में प्रवेश करेगा?