+ मोह से मोक्ष में की गई अभिलाषा भी मोक्ष-नाशिनी -
जायेतोद्गत-मोहतोऽभिलषिता, मोक्षेऽपि सा सिद्धिहृत्;
तद्भूतार्थ-परिग्रहो भवति किं, क्वापि स्पृहार्लुुनि: ।
इत्यालोचन-संगतैक-मनसा, शुद्धात्म-सम्बन्धिना;
तत्त्वज्ञान-परायणेन सततं, स्थातव्यमग्राहिणा ॥18॥
मोहजन्य मोक्षाभिलाष भी, शिव-रमणी को रुष्ट करे ।
अत: शुद्धनयाश्रित बुधजन, कोई इच्छा नहीं करें॥
तत्त्वज्ञान पारायण हैं जो, आलोचना सहित मुनिराज ।
शुद्धातम में लीन रहें अरु, तजें परिग्रह सभी प्रकार॥
अन्वयार्थ : अन्तरंग में उत्पन्न मोह से मोक्ष की इच्छा करें तो वह इच्छा भी स्वयं मोक्ष का नाश करने वाली होती है; अत: शुद्धनिश्चयनय का आश्रय करने वाला जीव, किसी प्रकार की इच्छा नहीं करता है, किन्तु जिन मुनि का मन आलोचना से सहित है, जो शुद्ध आत्मा से सम्बन्ध रखने वाले हैं और तत्त्वों के ज्ञान में दत्त-चित्त हैं; उन मुनिराजों को सभी प्रकार के परिग्रहों से रहित रहना चाहिए ।