
तिक्तेष्वाकु-फलोपमं वपुरिदं, नैवोपभोग्यं नृणां;
स्याच्चेन्मोह-कुजन्म-रन्ध्र-रहितं, शुष्कं तपो-घर्मत: ।
नाऽन्तर्गौरवितं तदा भव-नदी-, तीरे क्षमं जायते;
तत्तत्तत्र नियोजितं वरमथा-, सारं सदा सर्वथा ॥4॥
कड़वी तुम्बी सम यह नरतन, किसी तरह उपभोग्य नहीं ।
यदि यह सूखे तप्त धूप में, मोह-जन्म के छिद्र नहीं॥
अन्तर में अभिमान न होवे, तो हो सकता भव-दधि-पार ।
अत: करो तप इसको पाकर, इसके बिन सबकुछ निस्सार॥
अन्वयार्थ : मनुष्य का शरीर, कड़वी तुम्बी के समान होने से सर्वथा उपभोग करने योग्य नहीं है । हाँ, यदि यह शरीर, मोह तथा जन्मादि छिद्रों से रहित हो, तपरूपी धूप से सुखाया गया हो, अन्तरंग अभिमान से रहित हो तो यह संसाररूपी नदी से पार करने में समर्थ हो सकता है; अत: ऐसे शरीर में उत्कृष्ट चन्दनादि लगाना भी सर्वथा असार ही है ।