+ शरीर की हीन अवस्था देख कर, उसके लिए पाप करने का निषेध -
(शार्दूलविक्रीडित)
पर्यन्ते कृमयोऽथ वह्नि-वशतो, भस्मैव मत्स्यादनात्;
विष्टा स्यादथवा वपु: परिणति:, तस्येदृशी जायते ।
नित्यं नैव रसायनादिभिरपि, क्षय्येव यत्तत्कृते;
क: पापं कुरुते बुधोऽत्र भविता, कष्टा यतो दुर्गति: ॥6॥
अन्त समय में कृमि हो जातीं, अथवा अग्नि भस्म करती ।
मत्स्यों द्वारा भक्षण से विष्टा होती, यह नित्य नहीं॥
विविध रसायन खाने पर भी, यह तन होता नष्ट अरे !
तो फिर कौन सुबुध दु:खदायक, दुर्गति कारक पाप करे॥
अन्वयार्थ : जिस शरीर में अन्तिम समय में लटें पड़ जाती हैं, जो अग्नि से भस्म हो जाता है, मछली आदि के खाने से जो विष्टारूप परिणत हो जाता है, जो नित्य नहीं है तथा अनेक प्रकार के रसायनादि (औषधियाँ) खाने पर भी जो नष्ट हो जाता है, उस शरीर के लिए संसार में कौन बुद्धिमान पुरुष होगा, जो पाप करेगा? जिससे भविष्य में पुन: नाना प्रकार के दु:खों को देनेवाली दुर्गति होगी ।