+ यदि स्वस्त्री से मैथुन उचित है तो पर्वों में स्वस्त्री का त्याग क्यों? -
यदि भवेदबलासु रति: शुभा; किल निजासु सतामिह सर्वथा ।
किमिति पर्वसु सापरिवर्जिता; किमिति वा तपसे सततं बुधै:॥3॥
निज-वनिता से रति यदि शुभ हो, तो फिर पर्व चतुष्टय में ।
क्यों नारी-संग तजें सत्पुरुष, बुध तप अङ्गीकार करें ?
यदि सज्जन पुरुषों का अपनी स्त्रियों के साथ मैथुनकर्म
अन्वयार्थ : करना, शुभ होता (उत्तम फल का देने वाला होता) तो वे अष्टमी, चतुर्दशी आदि पर्वों में अपनी स्त्री का त्याग क्यों करते हैं? तथा तपश्चरणादि के समय भी अपनी स्त्रियों को विद्वान लोग क्यों छोड़ देते हैं?