
रति-पतेरुदयान्नरयोषितो-रशुचिनोर्वपुषो: परि-घट्टनात् ।
अशुचि सुष्ठुतरं तदितो भवेत्; सुखलवे विदुष: कथमादर:॥4॥
कामोत्तेजित नर-नारी, तन-घर्षण से मैथुन होता ।
जिससे हो अपवित्र क्षणिक सुख, कैसे बुध आदर करता ?
अन्वयार्थ : रतिपति काम के उदय से उत्पन्न कामभावना से अत्यन्त अपवित्र दो शरीरों का आपस में परिघट्टन अर्थात् घिसना होता है, उस परिघट्टन से अत्यन्त अपवित्र फल की प्राप्ति होती है; इसलिए थोड़े से सुख की प्राप्ति के लिए विद्वान लोग, उस मैथुन का कैसे आदर कर सकते हैं?