+ काम-सम्बन्धी प्रीति, चैतन्य के वैरी मोह के फैलाव की कारण -
अशुचिनि प्रसभं रतकर्मणि; प्रति-शरीरि-रतिर्यदपि स्थिता ।
चिदरिमोहविजृम्भण-दूषणात्; इयमहो भवतीति निषेधिता ॥5॥
नर-नारी में मैथुन के प्रति, बलपूर्वक होता अनुराग ।
अत: निषेध, अज्ञानजन्य चित्-शत्रु मोह का यह विस्तार॥
अन्वयार्थ : काम के वशीभूत होकर जबर्दस्त राग सहित अत्यन्त अपवित्र मैथुनकर्म के होने पर कामी स्त्री-पुरुषों के शरीर में काम-सम्बन्धी प्रीति, चैतन्य के वैरी मोह के दूषण से उत्पन्न होती है; इसलिए यह काम-प्रीति, सर्वथा निषिद्ध मानी गई है ।