+ संयमरूपी वृक्ष का खण्डन करने में मैथुन तीक्ष्ण कुठार के समान -
निरवशेष-यम-द्रु -खण्डने;
शित-कुठार-हतिर्ननु मैथुनम् ।
सततमात्महितं शुभमिच्छता;
परिहृतिर्विधिनाऽस्य विधीयते ॥6॥
संयम-तरु पर इस मैथुन से, होता तीव्र कुठाराघात ।
अत: आत्महित के अभिलाषी, करते हैं इसका परित्याग॥
यह मैथुनकर्म, समस्त संयमरूपी वृक्ष के खण्डन करने में
अन्वयार्थ : तीक्ष्ण कुठार की धार के समान है; इसलिए जो मनुष्य, अपनी आत्मा का निर्मल हित करनेवाले हैं, वे सर्वथा इसका त्याग कर देते हैं ।