
मधु यथा पिबतो विकृतिस्तथा; वृजिन-कर्म-भृत: सुरते मति: ।
न पुनरेतदभीष्टमिहाङ्गिनां; न च परत्र यदायति दु:खदम् ॥7॥
मदिरा पिये पुरुष की भाँति, पापी को हो काम-विकार ।
किन्तु न इससे जीवों का हित, परभव में है अति दु:खकार॥
अन्वयार्थ : जिस प्रकार मदिरा पीने वाले पुरुष को विकार होता है, उसी प्रकार पापी पुरुष की सदा रति में ही इच्छा रहती है; किन्तु यह जीवों का किसी प्रकार से हित करने वाला नहीं है, अपितु परभव में भी अनेक प्रकार के दु:ख देने वाला ही है ।