+ सुलसा का सगर के साथ संगम -
अठाईसवाँ कल्प

  ग्रन्थ 

ग्रन्थ :

(अब सत्य व्रत का वर्णन करते हैं-)

अत्युक्तिमन्यदोषोक्तिमसभ्योक्तिं च वर्जयेत् ।
भाषेत वचनं नित्यमभिजातं' हितं मितम् ॥376॥
किसी बात को बढ़ाकर नहीं कहना चाहिए, न दूसरे के दोषों को ही कहना चाहिए और न असभ्य वचन ही बोलना चाहिए । किन्तु सदा हित-मित और सभ्य वचन ही बोलना चाहिए ॥376॥

तत्सत्यमपि नो वाच्यं यत्स्यात्परविपत्तये ।
जायन्ते येन वा स्वस्य व्यापदश्च दुरास्पदाः ॥377॥
किन्तु ऐसा सत्य भी नहीं बोलना चाहिए, जिससे दूसरों पर विपत्ति आती हो अपने ऊपर दुर्निवार संकट आता हो ॥377॥

प्रियशीलः प्रियाचारः प्रियकारी प्रियंवदः ।
स्यादानृशंसंधीनित्यं नित्यं परहिते रतः ॥378॥
मनुष्य को सदा प्रिय स्वभाववाला, प्रिय आचरणवाला, प्रिय करने वाला, प्रिय बोलने वाला, सदा दयालु और सदा दूसरों के हित में तत्पर होना चाहिए ॥378॥

केवलिश्रुतसषु देवधर्मतपःसु च ।
अवर्णवादवाअन्तु वेहर्शनमोहवान् ॥379॥
जो जीव केवली, शास्त्र, संघ, देव, धर्म और तप में मिथ्या दोष लगाता है, वह दर्शन मोहनीय कर्म का बन्ध करता है ॥379॥

मोक्षमार्ग स्वयं जाननर्थिने यो न भाषते ।
मदापह्नवमात्सर्यैः स स्यादावरणद्वयी ॥380॥
जो मोक्ष के मार्ग को जानता हुआ भी, जो उसे जानने को इच्छुक है उसे भी नहीं बतलाता, वह अपने ज्ञान का घमण्ड करने से, ज्ञान को छिपाने से तथा उसके सिवा दूसरा कोई न जानने पावे इस ईर्ष्या भाव से ज्ञानावरण और दर्शनावरण कर्म का बन्ध करता है ॥380॥

मन्त्रभेदः परीवादः पैशून्यं कूटलेखनम् ।
मुधासाक्षिपदोक्तिश्च सत्यस्यते विघातकाः ॥381॥
संकेत वगैरह से दूसरे के मनकी बात को जानकर उसे दूसरों पर प्रकट कर देना, दूसरे की बदनामी फैलाना, चुगली खाना, जो बात दूसरे ने नहीं कही या नहीं की, दूसरों का दबाव पड़ने से ऐसा उसने कहा या किया है इस प्रकार का झूठा लेख लिखना, और झूठी गवाही देना, ये सब काम सत्यव्रत के घातक हैं ॥381॥

परस्त्रीराजविद्विष्टलोकविद्विष्टसंश्रयाम् ।
अनायकसमारम्भां न कथां कथयेद्बुधः ॥382॥
समझदार मनुष्य को परायी स्त्रियों की कथा, राजविरुद्ध कथा, लोकविरुद्ध कथा और कपोलकल्पित व्यर्थ कथा नहीं कहनी चाहिएँ ॥382॥

असत्यं सत्यगं किंचित्किचित्सत्यमसत्यगम् ।
सत्यसत्यं पुनः किंचिदसत्यासत्यमेव च ॥383॥
वचन चार प्रकार का होता है। कोई वचन असत्य-सत्य होता है, कोई वचन सत्य-असत्य होता है । कोई वचन सत्य-सत्य होता है और कोई वचन असत्य-असत्य होता है ॥383॥

अस्येदमैदंपर्यम्-असत्यमपि किंचित्सत्यमेव, यथान्धांसि रन्धयति वयति वासांसीया ति। सत्यमप्यसत्यं किंचिद्यथार्धमासतमे दिवसे तवेदं देयमित्यास्थाय मासतमे संवत्सरतमे वा दिवसे ददातीति । सत्यसत्यं किंचिद्यवस्तु यहेशकालाकारप्रमाणं प्रतिपन्नं तत्र तथैवाविसंवादः । असत्यासत्यं किंचित्स्वस्यासत्संगिरते कल्ये दास्यामोति।


इसका यह अभिप्राय है कि कोई वचन असत्य होते हुए भी सत्य होता है, जैसे-'भात पकाता है, या कपड़ा बुनता है'। ये वचन यद्यपि असत्य हैं क्योंकि न भात पकाया जाता है और न कपड़ा बुना जाता है किन्तु पके हुए को भात कहते हैं, और बुन जाने पर कपड़ा कहलाता है, फिर भी लोकव्यवहार में ऐसा ही कहा जाता है इसलिए इस तरहके वचनोंको सत्य मानते हैं। इसी तरह कोई वचन सत्य होते हुए भी असत्य होता है। जैसे-किसी ने वादा किया कि पन्द्रह दिन में मैं तुम्हें अमुक वस्तु दे दूँगा ।किन्तु पन्द्रहवें दिन न देकर वह एक मास में या एक वर्षमें देता है ।यहाँ चूंकि उसने वस्तु दे दी इस लिए उसका कहना सत्य है किन्तु समय पर नहीं दी इस लिए सत्य होते हुए भी असत्य है। जो वस्तु जिस देश में, जिस काल में, जिस आकार में और जिस प्रमाण में जानी है उसको उसी रूपमें कहना सत्य-सत्य है । जो वस्तु अपने पास नहीं है उसके लिए ऐसा वचन देना कि मैं तुम्हें कल दूंगा असत्य-असत्य वचन है।

तुरीयं वर्जयेन्नित्यं लोकयात्रा प्रये स्थिता ।
सा मिथ्यापि न गीमिथ्या या गुर्वादिप्रसादिनी ॥384॥
इनमें से चौथे असत्य असत्य वचन को कभी नहीं बोलना चाहिए। क्योंकि लोकव्यवहार शेष तीन प्रकार के वचनों पर ही स्थित है। जो वचन गुरुजनों को प्रसन्न करनेवाला है, वह मिथ्या होते हुए भी मिथ्या नहीं है ॥384॥

न स्तूयादात्मनात्मानं न परं परिवादयेत् ।
न सतोऽन्यगुणान् हिंस्यानासतः स्वस्य वर्णयेत् ॥385॥
न स्वयं अपनी प्रशंसा करनी चाहिए और न दूसरों की निन्दा करनी चाहिए । दूसरों में यदि गुण हैं तो उनका लोप नहीं करना चाहिए और अपने यदि गुण नहीं हैं तो उनका वर्णन नहीं करना चाहिए कि मेरे में ये गुण हैं ॥385॥

तथा कुर्वन्प्रजायेत नीचैर्गोत्रोचितः पुमान् ।
उच्चैोत्रमवाप्नोति विपरीतकृतेः कृती ॥386॥
ऐसा करनेसे मनुष्य नीच गोत्रका बन्ध करता है , और उससे विपरीत करने से अर्थात् अपनी निन्दा और दूसरों की प्रशंसा करने से तथा दूसरों में गुण न होनेपर भी उनका वर्णन करने से और अपने में गुण होते हुए भी उनका कथन न करने से उच्चगोत्र का बन्ध करता है ॥386॥

यत्परस्य प्रियं कुर्यादात्मनस्तत्प्रियं हि तत् ।
अतः किमिति लोकोऽयं पराप्रियपरायणः ॥387॥
जो दूसरों का हित करता है वह अपना ही हित करता है फिर भी न जाने क्यों यह संसार दूसरों का अहित करने में ही तत्पर रहता है ॥387॥

यथा यथा परेवेतञ्चतो वितनुते तमः।
तथा तथात्मनाडीषु तमोधारा निषिञ्चति ॥388॥
जैसे-जैसे यह चित्त दूसरों के विषय में अन्धकार फैलाता है वैसे-वैसे अपनी नाड़ियों में अन्धकार की धारा को प्रवाहित करता है । अर्थात् दूसरों का बुरा सोचने से अपना ही बुरा होता है ॥388॥

दोषतोयैर्गुणग्रीष्मः संगन्तृणि शरीरिणाम् ।
भवन्ति चित्तवासांसि गुरूणि च लघूनि च ॥389॥
प्राणियों के चित्तरूपी वस्त्र यदि दोष रूपी जल में डाले जाते हैं तो भारी हो जाते हैं और यदि गुण रूपी ग्रीष्म ऋतु में फैलाये जाते हैं तो हल्के हो जाते हैं ॥389॥

सत्यवाक्सत्यसामर्थ्याद्वचासिद्धिं समश्नुते ।
वाणी चास्य भवेन्मान्या यत्र यत्रोपजायते ॥390॥
सत्यवादी को सदा सच बोलने के कारण वचन की सिद्धि प्राप्त होती है। जहाँ-जहाँ वह जो कुछ कहता है उसकी वाणी का आदर होता है ॥390॥

तामर्षहर्षायेम॒षाभाषामनीषितः।
जिह्वाच्छेदमवाप्नोति परत्र च गतिक्षतिम् ॥391॥
इसके विपरीत जो तृष्णा, ईर्षा, क्रोध या हर्ष वगैरह के वशीभूत होकर झूठ बोलता है उसकी ज़िहा कटवा दी जाती है और परलोक में भी उसकी दुर्गति होती है ॥391॥

असत्यभाषी वसु और पर्वत-नारद की कथा


श्रूयतामत्रासत्यफलस्योपाख्यानम्-जाङ्गलदेशेषु हस्तिनागनामावनीश्वरकुअरजनितावतारे हस्तिनागपुरे प्रचण्डदोर्दण्डमण्डलीमण्डनमण्डलानखण्डितभण्डनकण्डूलारातिकीर्तिलतानिबन्धनोऽभूदयोधनो नाम नृपतिः। अनवरतवसुविधाणनप्रीणितातिथिरतिथि मास्य महादेवी। सुता चानयोः सकलकलावलोकानलसा सुलसा नाम । सा किल तया महादेव्या गर्भगतापि मातेयेनैकोदरेशालिनो रम्यकदेशनिवेशोपेतपोदनपुरनिवेशिनो निर्विर्पक्षलक्ष्मीलक्षिताणमङ्गलस्य पिङ्गलस्य गुणगीर्वाणाचलरत्नसानवे सूनवे दुरवैरिवक्षःस्थलोहलनावंदानोद्योगलागलाय मधुपिङ्गलाय परिणिता बभूव । । भूभुजा च महोदयेन तेन विदितमहादेवीहृदयेनापि 'यस्य कस्यचिन्महाभागस्य भाग्यैभोग्यतया योग्यमिदं स्त्रैणं द्रविणं तस्यैतद्भयात् । अत्र सर्वेषामपि वपुष्मतामचिन्तितसुख दुःखागमानुमेयप्रभावं दैवमेव शरणम्' इति विगणेय्य स्वयंवरार्थ भीम-भीष्म-भरत-भागसङ्ग सगर-सुबन्धु-मधुपिङ्गलादीनामवनिपतीनामुपदानुकूलं मूलं प्रस्थायाम्बभूवे । अत्रान्तरे मगधमध्यप्रसिद्धयाराध्यायामयोध्यायां नरवरः सगरो नाम । स किल लास्यादिविलासकौशलसरसायाः सुलसायाः कर्णपरम्परया श्रुतसौरप्यातिशयो मनागुपरमत्तारुण्यलावण्योदयः प्रयोगेण तामात्मसाचिकीर्षुस्तौर्यत्रिकसूत्रे प्रतिकर्मविकल्पेषु संभोगसिद्धान्ते विप्रश्नविद्यायां स्त्रीपुरुषलक्षणेषु कथाख्यायिकाख्यानप्रवाहीकास्वपरासु च तासु तासु कलासु परमसंवीणतालताधरित्री मन्दोदरी नाम धात्री ज्योतिषादिशास्त्रनिशितमतिप्रसूति विश्वभूतिं च बहुमानसंभावितमनसं पुरोधसं तत्र पुरि प्राहिणोत् । "विशिकाशयशार्दूलदरी" मन्दोदरी तां पुरमुपगम्य परप्रतारणप्रगल्भमनीषा कृत"कात्यायिनीवेषा तत्तत्कलावलोकनकुतूहलमयोधनधरापालं निजनाथार्थसिद्धिपरवती" रजितवती सती'शुद्धान्तोपाध्यायी भूत्वा सुलसां सगरे संगरं प्राहयामास । तथा बकोटवृत्तिवेधाः स पुरोधाश्च तैस्तैरादेशैस्तस्य नृपस्य महादेव्याश्च वशीकृतचित्तवृत्तिः -


अब झूठ बोलने का क्या फल होता है इसके विषय में एक कथा सुनें -

जांगल देश में हस्तिनागपुर नाम का नगर है, वहाँ अयोधन नाम का राजा था। उसके अतिथि नामकी राजमहिषी थी। उनके समस्त कलाओं में निपुण सुलसा नामकी पुत्री थी। जब वह गर्भ में थी तभी रानी ने अपने सहोदर भाई पोदनपुर नरेश पिंगल के गुणी पुत्र मधुपिंगल के साथ उसका वाग्दान करने का संकल्प कर लिया था।

राजा को यद्यपि रानी के हृदयकी बात ज्ञात थी फिर भी उसने सोचा कि 'यह स्त्रीधन जिस किसी महाभाग के भाग्य में भोगने के योग्य है उसी का यह होना चाहिए। इस विषय में सब शरीरधारियों का दैव ही शरण है और दैव का प्रभाव अचानक सुख-दुःख के आगमन से अनुमेय है।' ऐसा जानकर उसने स्वयंवर के लिए भीम, भीष्म, भरत, भाग, संग, सगर, सुबन्धु और मधुपिंगल वगैरह राजाओं के पास भेट पूर्वक पत्र भिजवा दिये।

इसी बीचमें एक दूसरी घटना घटी। अयोध्या के राजा सगर ने कानों-कानों नृत्य आदि कला में कुशल सुलसा के सौन्दर्य की चर्चा सुनी। इस राजा का तारुण्य अपने लावण्य के साथ थोड़ा ढल चला था। अतः उसने उसे उपाय से अपनाने के लिए ज्योतिष आदि शास्त्रों में प्रवीण विश्वभूति नामक पुरोहित के साथ मन्दोदरी नाम की धाय को सुलसा की नगरीमें भेजा। वह धाय सब कलाओं में प्रवीण थी, गाना-बजाना और नाचना जानती थी। साज-शृङ्गार करने में चतुर थी। सम्भोग के सिद्धान्त, सामुद्रिक विद्या, स्त्री पुरुष के लक्षण, कथा-कहानी और पहेली में पूरी पण्डिता थी।

उस नगरमें पहुँचकर दूसरों को ठगने में पटु उस धाय ने प्रौढ़ा स्त्री का वेष बनाया और अपने स्वामी का प्रयोजन सिद्ध करने के लिए तरह-तरह की कलाएँ दिखाकर राजा अयोधन को प्रसन्न कर लिया तथा उसके अन्तःपुर में अध्यापिका बनकर सुलसा से यह प्रतिज्ञा करा ली कि वह सगर को ही वरण करेगी । बगुला भगत पुरोहित ने भी तरह-तरहके आदेशों से राजा और रानी का मन अपने वशमें कर लिया। उसने स्वयं श्लोक रच-रचकर राजा-रानी को सुनाये जिनका भाव इस प्रकार था --

कुण्टे षष्टिरशीतिः स्यादेकाक्षे बधिरे शतम् ।
वामने च शतं विंशं दोषाः पिङ्गे त्वसंख्यया ॥392॥
टुण्टे में 60 दोष होते हैं, काने में अस्सी और बहरे में सौ दोष होते हैं। बौने में एक सौ बीस दोष होते हैं। किन्तु जिसकी आँखं पीतवर्ण की होती हैं, उसमें तो अगणित दोष होते हैं ॥392॥

मुखस्याधं शरीरं स्याद्घाणार्ध मुखमुच्यते।
नेत्रार्धं घ्राणमित्याहुस्तत्तेषु नयने परे ॥393॥
तथा, शरीर में मुख के आधे भाग का जो मूल्य है वह पूरे शरीर के बराबर है। नाक के आधे भागका मूल्य पूरे मुख के बराबर है ।और आधे नेत्रका मूल्य पूरी नाकके बराबर है। इसलिए उन सबमें नेत्र ही वेशकीमत होते हैं ॥393॥

इत्यादिभिः स्वयं विहितविरचनैर्मधुपिङ्गले विप्रीतिं कारयामास । ततश्चाम्पेयमञ्जरीसौरभपयःपानलुब्धबोधस्तनन्धयेषु पुष्पन्धयेष्विव मिलितेषु तेषु स्वयंवराह्वानश्पृङ्गारिताहङ्कारेषु महोश्वरेषु सा मन्दोदरीवशमानसा सुलसा श्रुतिमनोहरं सगरमवृणीत्तन्निम्नधरोपगाएँगेव सागरम् । भवति चात्र श्लोकः -


इस प्रकार के वचनों से उसने उन्हें मधुपिंगल के प्रति विरक्त बना दिया ।

इसके बाद स्वयंवर हुआ। जैसे चम्पे की कली की सुगन्धि रूपी दुग्ध का पान करनेके लिए भौंरे एकत्र हो जाते हैं उसी तरह स्वयंवर के निम्नतरण को पाकर मदमत्त हुए सब राजा उसमें सम्मिलित हुए। सुलसा का मन तो मन्दोदरी के वश में था। अतः जैसे नीची भूमिकी ओर बहनेवाली नदी सागर में जाकर मिल जाती है वैसे ही उसने उन राजाओं में-से सगर राजाको वरण कर लिया ।

इस विषय में एक श्लोक है जिसका भाव इस प्रकार है --

अल्पैरपि समथैः स्यात्सहायैर्विजयो नृपः।
कार्यायोन्तो हि कुन्तस्य दण्डस्त्वस्य॑ परिच्छदः ॥364॥
शक्तिशाली थोड़े से भी सहायकों के द्वारा राजा विजयी होता है। जैसे भाले की नोक ही अपना काम करती है, उसमें लगा डंडा तो उसका सहायक मात्र है ॥394॥

इत्युपासकाध्ययने सुलसायाः सगरसंगमो नामाष्टाविंशः कल्पः ।


इस प्रकार उपासकाध्ययनमें सुलसा का सगर के साथ संगम नाम का अठाईसवाँ कल्प समाप्त हुआ ।