+ अपूर्वकरण और अनिवृत्तिकरण के स्वरुप का निरूपण -
समय समय भिण्णा भावा तम्हा अपुव्व करणो दु
अणियट्टीवि तहं वि य पडिसमयं एक्कपरिणामो ॥36॥
अन्वयार्थ : [समय समय] प्रति समय [भिण्णा] भिन्न [भावा] भाव होते हैं [तम्हा] इसलिए [अपुव्व करणो] अपूर्वकरण [दु] है [य] तथा [पडि समय] प्रति समय [एक्कपरिणामो] एक समान परिणाम होते है [वि] वह [अणियट्टीवि] अनिवृत्तिकरण है

  बोधिनी 

बोधिनी :


समये समये भिन्ना भावा तस्मादपूर्वकरणो हि;;अनिवृत्तिरपि तथैव च प्रतिसमय मेकपरिणाम: ॥
१-जिस करण में प्रतिसमय अपूर्व अर्थात असमान, नियम से अनन्त-गुण रूप वृद्धिंगत विशुद्ध परिणाम होते है वह अपूर्वकरण है । इस करण में होने वाले परिणाम प्रत्येक समय में असंख्यात-लोकप्रमाण होकर भी अन्य समय में स्थित परिणामों के सदृश नहीं होते, यह उक्त का भावार्थ है (ज.ध.पु.१२ पृ २३४)

२-जिस करण में विध्यमान जीवों के एक समय में परिणाम भेद नहीं है वह अनिवृत्तिकरण है । (ज.ध.पु.१२ पृ २३४)। अनिवृत्तिकरण में प्रत्येक समय में एक एक ही परिणाम होता है क्योंकि यहां एक समय में जघन्य व उत्कृष्ट भेद का अभाव है । (ध.पु.६ पृ.२२१) एक समय में वर्तमान जीवों के परिणामों की अपेक्षा निवृत्ति या विभिन्नता जहाँ नहीं होती वे परिणाम अनिवृत्तिकरण कहलाते हैं ।