जीवतत्त्वप्रदीपिका
वेगुव्विय-आहारयकिरिया, ण समं पमत्तविरदम्हि।
जोगो वि एक्ककाले, एक्केव य होदि णियमेण॥242॥
अन्वयार्थ :
छठे गुणस्थान में वैक्रियिक और आहारक शरीर की क्रिया युगपत् नहीं होती और योग भी नियम से एक काल में एक ही होता है ॥242॥
जीवतत्त्वप्रदीपिका