जीवतत्त्वप्रदीपिका
जेसिं ण संति जोगा, सुहासुहा पुण्णपावसंजणया।
ते होंति अजोगिजिणा, अणोवमाणंतबलकलिया॥243॥
अन्वयार्थ :
जिनके पुण्य और पाप के कारणभूत शुभाशुभ योग नहीं हैं उनको अयोगिजिन कहते हैं। वे अनुपम और अनंत बल से युक्त होते हैं ॥243॥
जीवतत्त्वप्रदीपिका